भारत माँ का अमर सपूत: चंद्रशेखर आज़ाद
The Immortal Son of Mother India: Chandrashekhar Azad
| आजाद in 1926 |
दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे!"
यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत माँ के उस वीर सपूत का प्रण था जिसने अपनी अंतिम सांस तक ब्रिटिश हुकूमत के आगे सर नहीं झुकाया। चंद्रशेखर आज़ाद—एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही हर भारतीय का हृदय गर्व और देशभक्ति की भावना से भर उठता है।
आज़ाद का वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। मात्र 15 वर्ष की नन्हीं उम्र में जब वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए, तो ब्रिटिश जज ने उनसे उनका नाम पूछा। उन्होंने पूरे स्वाभिमान से जवाब दिया
- नाम: आज़ाद
- पिता का नाम: स्वतंत्रता
- पता: जेलखाना
उनकी इस निडरता से तिलमिलाकर जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई। हर कोड़े की मार पर युवा चंद्रशेखर के मुख से केवल एक ही गूंज निकलती थी—"भारत माँ की जय!" उसी दिन से देश ने उन्हें 'आज़ाद' कहना शुरू कर दिया।
जब देश में आंदोलन का रास्ता बदला, तो आज़ाद ने क्रांति का मार्ग चुना। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के मुख्य कर्णधार बने और भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु जैसे अनगिनत युवाओं के प्रेरणास्रोत बने। काकोरी कांड से लेकर सांडर्स वध तक, उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी। अंग्रेज पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए दिन-रात एक करती रही, लेकिन आज़ाद की रणनीति और भेष बदलने की कला का कोई जवाब नहीं था।
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। अपनी पिस्तौल से दुश्मनों का सामना करते हुए जब उनके पास केवल एक आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अपनी ही पिस्तौल से देश के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। वे जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और अपने नाम को सार्थक कर गए।
आज बाजारीकरण और आधुनिकता के दौर में जहाँ हम अक्सर अपने इतिहास और संस्कृति को भूलने लगे हैं, वहीं चंद्रशेखर आज़ाद जैसे बलिदानियों के आदर्श हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। स्वतंत्रता केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत वीरों के लहू की कीमत है जो उन्होंने इस मिट्टी पर बहाया है।
आइए, हम सब मिलकर प्रयास करें कि अपनी भावी पीढ़ी को इन महान क्रांतिकारियों के त्याग और शौर्य की गाथाओं से अवगत कराएँ। देशभक्ति के इस अलख को अपने दिलों में जीवित रखें और अपने राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान देकर इस आज़ादी को अक्षुण्ण बनाए रखें।
चंद्रशेखर आज़ाद की अंतिम यात्रा और शहादत (27 फरवरी 1931)
चंद्रशेखर आज़ाद ने ब्रिटिश हुकूमत से यह वादा किया था कि वे कभी भी जीते-जी पुलिस के हाथ नहीं आएँगे। उन्होंने इस प्रण को अपनी अंतिम सांस तक निभाया।
1. अल्फ्रेड पार्क की ऐतिहासिक घेराबंदी 27 फरवरी 1931 की सुबह, चंद्रशेखर आज़ाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ़्रेड पार्क में अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर संगठन के भविष्य और गुप्त योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे। उसी समय, एक भेदिया (मुखबिर) की सूचना पर ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक नॉट-बावर (Not-Bower) ने भारी पुलिस बल के साथ पूरे पार्क को चारों तरफ से घेर लिया।
2. अकेला वीर और पूरी ब्रिटिश पुलिस अचानक हुई गोलीबारी से बेखबर आज़ाद ने तुरंत स्थिति को संभाला। वे एक विशाल जामुन के पेड़ के पीछे आड़ लेकर खड़े हो गए। उनकेपास केवल एक साधारण 'कोल्ट' पिस्तौल थी, जबकि पुलिस बल आधुनिक राइफलों से लैस था। आज़ाद ने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित बाहर निकलने का आदेश दिया और खुद अकेले पूरी पुलिस फ़ौज का सामना करने लगे।
3. अभूतपूर्व निशानेबाज़ी और वीरता आज़ाद का निशाना इतना अचूक था कि उन्होंने कई पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया और पुलिस प्रमुख को भी पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। आधे घंटे से अधिक समय तक चले इस भीषण युद्ध में आज़ाद के पैरों में गोलियाँ लग चुकी थीं और वे बुरी तरह घायल हो गए थे।
4. "आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे!" जब आज़ाद ने अपनी पिस्तौल की मैगज़ीन जाँची, तो उसमें केवल एक अंतिम गोली बची थी। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की जेल में जाने और उनकी गोलियों से मरने के बजाय अपनी प्रतिज्ञा को चुना। उन्होंने अपनी पिस्तौल अपनी कनपटी पर रखी और स्वयं को गोली मार ली।
24 वर्ष की अल्पायु में भारत माँ का यह निडर सपूत मातृभूमि की रक्षा करते हुए
शहादत के बाद का प्रभाव
उनकी मृत्यु के बाद ब्रिटिश पुलिस इतनी भयभीत थी कि किसी को भी उनके शव के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पहले उनके शव पर दूर से गोलियाँ चलाकर यह सुनिश्चित किया गया कि वे जीवित नहीं हैं। बिना किसी को बताए उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया, लेकिन जैसे ही यह खबर इलाहाबाद में फैली, पूरा शहर सड़कों पर उतर आया।
आज इलाहाबाद का वह पार्क 'चंद्रशेखर आज़ाद पार्क' के नाम से जाना जाता है, जो हर भारतीय को देशप्रेम और स्वाभिमान की प्रेरणा देता है।
| "ब्रिटिश पुलिस अधिकारी आज़ाद के पार्थिव शरीर के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। यह चंद्रशेखर आज़ाद की वही .32 बोर कोल्ट सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल है, जिसका इस्तेमाल उन्होंने पार्क में आखिरी बार किया था।" |
जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि अपनी मृत्यु से कुछ हफ्ते पहले आज़ाद उनसे मिले थे। वे यह जानने आए थे कि क्या 'गांधी-इरविन समझौते' के परिणामस्वरूप उन्हें भगोड़ा या कानून-विरोधी न माने जाने की कोई संभावना है। नेहरू ने लिखा कि आज़ाद और उनके कई साथी अपने तरीकों की 'व्यर्थता' को समझ चुके थे, हालांकि उन्हें इस बात पर भी पूरी तरह विश्वास नहीं था कि 'शांतिपूर्ण तरीके' काम करेंगे।
भारत भर में कई स्कूलों, कॉलेजों, सड़कों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों का नाम भी आज़ाद के नाम पर रखा गया है।
चंद्रशेखर आजाद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की रगों में दौड़ती हुई स्वाभिमान और क्रांति की ज्वाला का नाम है। महज 24 साल की उम्र में अल्फ्रेड पार्क की मिट्टी को अपने खून से सींचकर, उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि भारत मां का सच्चा बेटा कभी पराधीनता को स्वीकार नहीं कर सकता। वे जीते जी भी 'आजाद' रहे और मरते दम तक भी 'आजाद' ही रहे।
आज जब भी हम खुली हवा में सांस लेते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इस आजादी के पीछे 'आजाद' जैसे अनगिनत वीरों के लहू की गंध और अदम्य साहस छिपा है। आइए, उनके विचारों को अपने दिल में जिंदा रखें और एक बेहतर भारत के निर्माण का संकल्प लें। जय हिंद! जय भारत!"
| "अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद: एक दुर्लभ ऐतिहासिक क्षण" |